भगत सिंह की प्रतिमा संसद में तीस साल की जद्दोजहद के बाद स्थापित हो गई। स्वतंत्रता दिवस पर आज़ादी के महानायक के लिए इस सम्मान पर जाहिर तौर पर सबको खुशी हुई होगी। लेकिन क्रांतिवीर भगत सिंह की आत्मा शायद सम्मान को स्वीकारने के बजये बेबस पीड़ा से करह रही होगी.हँसते हँसते फँसी के फंदे के चूमने वाले आज़ादी के दीवाने कैसे बर्दास्त करेंगे की उनकी प्रतिमा उस प्रांगन में मूकदर्शक बन कर रहेगी जिसे नापाक आतंकी वारदात का निशाना बनना पड़ा। जिन वीरो ने अपनी जान की बजी लगाकर लोकतंत्र के इस मन्दिर और भारत देश की लाज को बचाया उनका कातिल आज भी सियासी बहस का मुद्दा बनकर शान से जिन्दा है.जिन लोगो ने मौलाना मसूद अजहर की रिहाई की त्रासदी को देखा hai उनकी ये चिंता भी अन्यास नही हो सकती की कही एक और कंधार जैसी वारदात को दोहराकर देश की शान पर हमला करने वाले अफजल को भी आतंकी पुरे देश को मुह चिढ़ते हुए लेकर चले जाए। संसद पहुंचकर भगतh को बापू से भी एक sikayat होगी की वे भी अब अहिंसा ka रत्ता लगना छोड़ संसद में मौन होकर आँखे बंद कर बैठे हैं.इस भरोसे की शायद अपने आप ही कुछ चमत्कार हो जाए।
swantah सुखाय चेरिताबल ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया टीम.
2 comments:
bhagat singh jaise krantiveero ki jarurat desh ko siddat se mahsus ho rahi hai.
vivekanand.
delhi.
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