प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वतंत्रता की ६२ वी वर्षगांठ पर राष्ट्र के नाम संबोधन में ज्यादातर पुरानी बाते दोहराई है। अपने कार्यकाल के अन्तिम साल में उन्होंने अपने naram अंदाज़ में लगभग हर मुद्दे को टटोला,लेकिन हाल ही में जिन समस्याओ ने पुरे देश को चिंतित किया है मनमोहन ne उन पर ऐसी कोई बात नही कही जो लोगो को अपील करे। खासकर अमरनाथ श्रीन बोर्ड के मसले पर और महंगाई की आग पर जिसमे देश का बहुसंख्यक व्यक्ति झुलस रहा है. शिछा के फोरम पर मनमोहन ne देस को जो कुछ बताया वह भारत के प्रगति सोपान पर आगे बढ़ने की कहानी जरूर बताता है, आई आई टी और आईआईएम की संख्या बढ़कर दूनी हो गई है.विश्वविद्यालय और कालेज भी बढ़ी संख्या में खुल रहे है. लेकिन मनमोहन को shayad ध्यान होगा कि राइट टू एजूकेशन का मसला अभी सपना ही है और इसके बिना असल लडाई बाकी ही रहेगी। हाँ सबसे महत्वपूर्ण तोहफा देश के उन लोगो को मिला है जो महीने के सातवे दिन से ही अगली तनख्वाह का इंतजार करने लगता है.लेकिन सवाल फिर भी कि क्या काम काज का ढर्रा भी बदलेगा। क्या बढ़ी तनख्वाह इतनी है कि कर्मचारिओं को उस उपरी आमदनी से परहेज होने लगे जो ख़ुद उन्हें भी अपने महकमे से बाहर छोटे छोटे कामो के लिए रुलाती है.और भी अच्छा लगता जब मनमोहन देश की संसद में सांसदों के बिकने कि कहानी पर भी कुछ कहते। साथ में संकल्प का इजहार भी कि संसद वैशाली कि नगरवधू नही हो सकती। आख़िर हमारी स्वतंत्रता का आइना तो यही है.
Thursday, August 14, 2008
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